आत्मप्रेम करने की ऋतु-बसंत

आत्मप्रेम करने की ऋतु-बसंत

जो महत्व सैनिकों शक्ति उपासकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों और गुरुभक्तों के लिए अपनी पुस्तकों, व्यास पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा का है, जो उद्योगपति, व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व आत्मप्रेमियों के लिए वसंत पंचमी का है।

एक अनूठी आकर्षक ऋतु है वसंत की

 न सिर्फ बुद्धि की अधिष्ठात्री, विद्या की देवी सरस्वती का आशीर्वाद लेने की, अपितु स्वयं के मन के मौसम को परख लेने की, रिश्तों को नवसंस्कार – नवप्राण देने की। गीत की, संगीत की, प्रकृति के जीत की, हल्की-हल्की शीत की, नर्म-नर्म प्रीत की।

मन को बनाये सन्त-

ठंड के अन्त में बसंत का यह पर्व हर साल फरवरी माह में आगमन होता है। आत्मप्रेम में मग्न इस मौसम में धरती माँ, खुद से इतराकर, प्रसन्न होकर संसार को प्रेम से लबालब कर देती है। भारत माँ की कोख से उत्पन्न हरियाली को देखकर देव-दानव, पशु-पक्षी और जीव-जगत के चरा-चर प्राणी आत्मप्रेम का अनुभव करते हैं।

अपनेपन और आत्मप्रेम का एहसास

बसन्त ऋतु में धरा मदमस्त हो जाती है।
यही कारण है कि वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव, तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं।

बागों में बहार है-

 जब फूलों पर बहार आती है, खेत-खलिहानों में सरसों का सोना चमकने लगता है।
 गेहूँ और जौ की बालियाँ खेतों में खिलने लगतीं हैं,  आम्र वृक्ष पर बौर आ जाता है और हर तरफ़ हरि-हर की हरियाली एवं रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं हैं।
 देवदारू वृक्ष की श्यामल छाया सघन हो उठती है। अंगूरों की लता रसमयी हो जाती है। अशोक वृक्ष अग्निवर्णी लालपुष्पों से लद जाता है।
भारत में वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए एक बड़ा उत्सव मनाया जाता है जिसमें भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा की परम्परा अति प्राचीन है। यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता है।
 मां शारदे, हमें तार दे ….
फरवरी का यह पूरा महीना ही सबको उमंग, उत्साह देने वाला है, पर माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को
पड़ने वाला वसंत पंचमी का यह पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है।
आम्र मंजरियों की नशीली रतिगंध का मौसम। ऋतुओं का यशस्वी राजा वसंत युवा-मन पर बड़ी कोमल प्यार भरी। दस्तक देता है। मन की बगिया में केसर, कदंब और कचनार सज उठते हैं, बाहर पलाश, सरसों और अमलतास झूमने लगते हैं।

कैसे करें आत्मप्रेम

@ प्रबल आकर्षण में भी पवित्रता का प्रकाश संजोकर रखो और उत्साह, आनंद एवं उत्फुल्लता का बाहर-भीतर संचार करो।
@ अपने अच्छे विचार, सोच और आईडिया को प्रेम करो।
@ अपने शरीर की देखभाल और स्वास्थ्य से प्यार करो।
@ समय पर सोना, सुबह जल्दी जागना,
अपने को हमेशा हेल्दी बनाये रखना
अपना ख्याल रखना ये सब भी आत्मप्रेम का प्रतीक है।
@ किसी और से प्यार करने की अपेक्षा एक बार आप खुद से भी प्रेम करके देखो।

हमेशा अपना मनोबल बढ़ाएं –

आप बहुत ही अच्छे, सच्चे, भावुक, मेहनती, लग्नशील, ईमानदार इंसान हैं,
इन सकारात्मक सोच से अपने मन, बुद्धि
और आत्मा को प्यार करें।
दोस्तों की बुराइयों को दूर करते हैं। सही व उचित मार्गदर्शन देते हैं, उन्हें चाहते हैं,  इसीलिए आप स्वयं से प्यार करने के अधिकारी हैं।
खुशियों के लिए क्यों..
किसी का इंतज़ार,
आप ही, तो हो अपने..

जीवन के शिल्पकार!!!


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