आयुर्वेदानुसार शरीर का विज्ञान क्या है?

स्वास्थ्य सम्बंधित 18 काम की जानकारी…

  1. शरीर के घटकों का कार्य समझ लेना होगा, तथा उसे सुचारू रूप स चलाने के लिये कर्मशील बनना होगा। यह हमारा एक प्रधान कर्तव्य है । क्यों कि इस शास्त्र की शिक्षा से हमें बहुत कुछ लाभ मिल सकता है।
  2. मानव-शरीर- शास्त्र के शरीर रचना, इंद्रिय-विज्ञान तथा आरोग्य-शास्त्र ही मुख्य अंग है। केवल एक अंग का अभ्यास करने से ही कार्य नहीं चल सकता, क्योंकि इन अंगों का परस्पर घनिष्ट संबंध है।
  3. वात-पित्त-कफ का असन्तुलन ही त्रिदोष कहलाता है। अगर देह त्रिदोष युक्त है, तो रोगों का आगमन आरम्भ होने लगता है।
  4. अंग्रेजी भाषामें एक कहावत है “ If you are pure, you don’t need a cure ” जिसका यही अर्थ हो सकता है कि यदि हम शुद्धाचरण पालते हैं, तो हमें औषधियों की आवश्यकता नहीं होना चाहिये।
  5. किन्तु जब हम निरोग एवं निकोप प्रकृति रखेगें, तभी यह सत्य हो सकता है।
  6. आयुर्वेद चिकित्सा पध्दति के मुताबिक जो मनुष्य अपने तन यानी शरीर से बलवान होता है वह मन से भी बलवान होता है “Mans sana in Corpore sana.” उसके मन में न तो बुरी भावनायें उप्तन्न होती और न आचरण में गल्तियां ही हो पाती है।
  7. न वह किसी से डरता है और न उसे कोई छेडछाड करने का प्रयत्न ही करेगा।
  8. दुष्ट और गंदे विचार तो अशक्त मनुष्य में ही पाये जाते हैं। उसमें आत्मविश्वास की भावना उत्पन्न नहीं होने पाती। तथा ‘आगे क्या होगा’ इसी विचारधारा में वह अपने तन एवं मन को हानि पहुंचाता रहता है।
  9. ऐसी परिस्थिति में उससे शुद्धाचरण की क्या आशा की जा सकती हैं ? वैसे देखा जाय तो मनुष्य का शरीर ही नाशवान यानी मरणाधीन होता है। किन्तु हमें यह सोचना चाहिये कि जिस किसी भी दिन हमें मरना है, तो कम से कम उस समय तक हमें निरोगिता के साथ ही जीवित रहना चाहिये।
  10. यह बात मानव के लिये असंभव नहीं कि वह अपने आचरण एवं आत्मविश्वास के बल पर उस घडी को दूर न ढकेल सकेगा। हम जानते हैं कि किसी घायल मनुष्य के शरीर में से अधिक मात्रा में रक्त बहकर व्यर्थ नष्ट हो रहा हो, तो प्राकृतिक साधनों का उपयोग करते हुए. उसके शरीर से बहती हुई रक्त की धारा को रोक कर और अन्य साधनों से ‘अतिरिक्त रक्त’ शरीर में भर कर हम उसे अच्छा कर सकते हैं।
  11. क्या कारण है? कि हम कुछ आवश्यक नियमों का पालन करने से अपने को दिर्धायुषी न बना सकें।
  12. शरीर के विषय में कुछ आवश्यक झान की प्राप्त कर लेना हम अपना कर्तव्य अभी तक नहीं समझते थे!
  13. अब यह बात सिद्ध हो गई है कि अन्य देशों में विज्ञान-शास्त्र के अन्तर्गत किये गये नये-नये आविष्कार और उनकी फल प्राप्ति को देखते हुए इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त कर लेना हमारा सर्व प्रथम कर्तव्य है।
  14. मानव-जीवन का, संसार की अन्य असंख्य वस्तुओं से ही काल तक संबध आता है परंतु शरीर का संबंध मनुध्य की जन्म-घटिका से लेकर उस की मृत्यु तक रहता है।
  15. अत: यह स्पष्ट है कि यह संबंध सबसे लम्बा है। मनुष्य के शरीर में जो कायशाली शक्तियां विद्यमान हैं या जो विशेष गुण पाये जाते हैं उन्ही के बळपर वह अपनी आकांक्षाओं को सफल बनाने का दीर्घ काल तक प्रयत्न करता है।
  16. इस कार्य में इन सुब प्रयत्नों का फलद्दुप होना शरीर के सामर्थ्य पर ही निर्भर है। सतत प्रयत्न तथा दीर्ध उद्योग करने के लिये निरोग प्रकृति एवं बलवान शरीर न हो तो यह कैसे संभव हो सकता है ?
  17. अत: प्रकृति को निरोग तथा शरीर-शक्ति को दीर्घकाल तक बनाए रखने के लिये यह नितांत आवश्यक है कि हमें बहुत कुछ संबंधित ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिये। इस-हेतु हमें शरीर की रचना देखना होगी।
  18. अत: आयुर्वेद शास्त्रों के पूर्वार्ध में शरीर-रचना तथा इंद्रिय-विज्ञान का वर्णन, और उत्तरार्ध में आरोग्य शास्त्र का वर्णन किया गया है।

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