20 प्रकार की योनि और योनि रोग योनि को अन्य भाषाओं में क्या कहते हैं?

लोग जानकर हैरान हो जाएंगे कि स्त्री  की योनि 20 प्रकार की होती है। और अत्यानन्दा, अतिचरणा योनि वाली औरतें बहुत ही सेक्सी होती हैं।

रबड़ जैसा मांस का यह पिंड अर्थातयोनि/Vagina की तरफ दुनिया का  इतना आकर्षण क्यों है?…

ढीली योनि या भग को तंग या टाइट करने  के 50 घरेलू नुस्खे जाने….







27 तरह के स्त्री रोगों की आयुर्वेदिक ओषधि-

नारी सौंदर्य माल्ट

एवम

NARI SOUNDARY Capsule

एक विशेष असरकारक दी है, जो  5 प्रकार के श्वेत प्रदर, सोम रोग, पीसीओडी, गर्भ न ठहरना, बार बार गर्भपात होना, सुंदरता में कमी आदि नारी विकारों को  जड़ से दूर कर सौंदर्य वृद्धि करने में सहायक है।

[email protected] योनि क्या होती है?.

[email protected] योनि रोग कितने तरह के होते हैं?

[email protected] 20 प्रकार की योनि में सम्भोग योग्य सर्वश्रेष्ठ योनि कौनसी होती है?..

[email protected] योनि के अन्य नाम क्या है?

[email protected] गाली गलोंच के समय योनि, चूत, भोसड़ा शब्द का उपयोग क्यों करते हैं?

[email protected] क्रोध में अधिकांश लोग मां बहिन की गाली  में योनि रूपी चूत का इस्तेमाल क्यों करते हैं?..

स्त्री योनि के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्रस्तुत  करने वाला यह अमृतम ब्लॉग सारे भ्रम  मिटाकर ज्ञान वृद्धि करेगा।

योनि के बहुत से दुर्लभ रहस्य जाने..

योनि/Vagina की संरचना.…

स्त्री की योनि ऊतकों, तंतुओं, मांसपेशियों  और नसों से बनी होती है। योनि केवल  वुलवा का एक अंग हैं।  वुलवा पूरे बाहरी महिला जननांग का नाम  है – इसमें महिला की लेबिया, क्लाइटोरिस,  योनि द्वार (वजाइनल ओपनिंग) और मूत्र मार्ग का द्वार (वह छेद जहां से आप पेशाब करती हैं) शामिल है। जबकि कई लोग जब “योनि” कहते हैं, तब वे वास्तव में वुलवा की बात कर रहें होते हैं …

योनि के सबसे बाहरी म्यूकोसल ऊतक को आपस में जुड़े हुए ऊतक की एक परत से सहारा मिलता है, जो योनि के लुब्रिकेशन हेतु श्लेष्म (म्यूकस) पैदा करने के लिए मिलकर काम करते हैं।इनके नीचे चिकनी मांसपेशियों की एक परत होती है, जो संकुचित हो सकती है या फैल सकती है, इसके बाद जुड़े हुए ऊतक की एक अन्य परत होती है जिसे अडवेंटिशिआ (adventitia) कहा जाता है।

योनि क्या होती है?

किसी भी स्त्री की योनि उसके गुप्तिंद्रीय जननांग का एक हिस्सा है। बर्थ केनाल भी इसी से जुड़ा भाग है। स्त्री मिलन के दौरान इसी योनि में पुरुष अपना लिंग डालकर सहवास करता है। हर महीने का मासिक धर्म या माहवारी इसी योनि से होता है।

योनि कितने तरह की होती है?…

तन्त्र तथा आयुर्वेदिक ग्रंथों में वात योनि, पित्त योनि, कफ योनि एवम त्रिदोषज ये सभी 5-5 प्रकार की बताई गई हैं। ये पांचों योनि रोग वात, पित्त, कफ (त्रिदोष)यानि तीनों दोषों के कारण होते हैं।

योनि रोग क्या है?

प्रदर रोग गर्भाशय का रोग है। सोम-रोग शरीर के धातु सम्बन्धी निर्बलता का रोग है। इनका प्रत्यक्षीकरण योनि के माध्यम से होता है, किन्तु ये दोनों योनि रोग नहीं हैं। प्राचीन तंत्रशास्त्र में योनि रोगों के विस्तृत विवरण मिलते हैं।

योनि रोग होने के क्या कारण हैं?...

मिथ्याचार, मिथ्या विहार, दुष्ट आर्त्तव, वीर्यदोष, दैवेच्छा, गर्भपात करवाना, चोट, अप्राकृतिक मैथुन आदि कारणों से होता है।

आयुर्वेद में भी योनि रोगों को अलग से स्थान दिया गया है। ये 20 प्रकार के होते हैं।जो निम्नलिखित हैं…

वायु या वात योनि रोग

 – 1. उदावृता, 2. बन्ध्या, 3. विप्लुता, 4. परिप्लुता, 5. वातला- ये पांच योनि-रोग वायु रोग के कारण हैं। –

1. उदावृता– जिस स्त्री की योनि से झाग मिला हुआ खून, बड़ी तकलीफ के साथ गिरता है, उसे ‘उदावृता’ कहते हैं। उदावृता योनि-रोग वाली स्त्री का मासिक धर्म बड़ी तकलीफ से होता है । उसके पेडू में दर्द होकर रक्त की गांठ-सी गिरती है।

2. बन्ध्या – जिसका आर्त्तव नष्ट हो; यानी जिसे रजोधर्म न होता हो, उसे अगर होता हो तो अशुद्ध और ठीक समय पर न होता हो, ‘बन्ध्या’ कहते हैं।

3. विप्लुता – जिसकी योनि में निरन्तर पीड़ा या भीतर की ओर सदा एक तरह का दर्द-सा होता रहता है, उसे ‘विप्लुता’ योनि कहते हैं।

4. परिप्लुता– जिस स्त्री को मैथुन कराते समय योनि के भीतर बहुत पीड़ा होती है, उसे ‘परिप्लुता’ योनि कहते हैं।

5. वातला – जो योनि कठोर या कड़ी हो तथा उसमें शूल और चोंटने की-सी पीड़ा हो उसे ‘वातला’ योनि कहते हैं। इस रोग वाली का मासिक खून या आर्त्तव, बादी से रूखा होकर, सुई चुभाने- सा दर्द करता है।

पितृदोष के कारण उत्पन्न ५ योनि रोग…

1. लोहितक्षरा– जिस योनि से दाहयुक्त रुधिर बहता है, यानी जिस योनी से जलन के साथ गरम-गरम खून बहता है, उसे ‘लोहिताक्षरा’ कहते हैं।

2. वामनी – जिसकी योनि अधिक देर तक मैथुन करने से, लिंग की रगड़ के मारे, बाहर निकल आये, यानी स्थान- भ्रष्ट हो जाय और विमर्दित करने से प्रसव- योग्य न हो, उसे प्रस्रंसिनी’ योनि कहते हैं। अगर ऐसी स्त्री को कभी गर्भ रह जाता है, तो बच्चा बड़ी मुश्किल से जन्म लेता है।

3. प्रसंसिनी– जिस स्त्री की योनि, पुरुष के मैथुन करने के बाद, पुरुष के वीर्य और स्त्री की रज- दोनों को बाहर निकाल दे, उसे ‘वामनी’ योनि कहते हैं।

4. पुत्रध्नी– जिस स्त्री को रुधिर क्षय होने से गर्भ न रहे, वह ‘पुत्रघ्नी’ योनि वाली होती है। ऐसी योनि वाली स्त्री का मासिक खून, गर्म होकर कम हो जाता है और गर्भगत बालक असमय ही गिर जाता है। –

5. पित्तला– जो योनि अत्यन्त दाह, पाक और ज्वर- इन लक्षणों वाली हो, वह ‘पित्तला’ है। इस योनि वाली स्त्री की भग के भीतर दाह या जलन होती है और भग के मुँह पर छोटी-छोटी फुन्सियां हो जाती हैं और पीड़ा से उसे ज्वर चढ़ आता है।

पित्त की वजह से – 1. लोहिताक्षरा,

2. प्रस्रंसिनी, 3. वामनी, 4. पुत्रघ्नी,

5. पित्तला – ये पांच योनि-रोग पित्त

दोष के कारण होते हैं। –

कफ असंतुल से होने वाले योनि विकार

1. अत्यानन्दा, 2. कर्णिनी, 3. चरणा,

4. अतिचरणा, 5. कफजा- ये पांच योनि-रोग

कफ के दोष के कारण होते हैं।

1. अत्यानन्दा– जिस स्त्री की योनि अत्यधिक मैथुन करने से भी सन्तुष्ट न हो, उसे ‘अत्यानन्दा’ योनि कहते हैं । इस योनि वाली स्त्री एक दिन में कई पुरुषों से मैथुन कराने से भी सन्तुष्ट नहीं होती। यही कारण है कि ऐसी स्त्रियों को गर्भ नहीं रहता।

2. कर्णिनी– जिस स्त्री की योनि के भीतर गर्भाशय में कफ और खून मिल कर, कमल के इर्द-गिर्द मांसकन्द-सा बना देते हैं, उसे ‘कर्णिनी’ कहते हैं।

3. चरणा – जो स्त्री मैथुन करते समय पुरुष से पहले ही छूट जाती है और वीर्य ग्रहण नहीं करती, उसकी योनि ‘चरणा’ होती है।

4. अतिचरणा – जो स्त्री कई बार मैथुन करने पर छूटती है, उसकी योनि ‘अतिचरणा’ होती है। ऐसी योनि वाली स्त्री कभी एक पुरुष की होकर नहीं रह सकती। चरणा और अतिचरणा योनि वाली स्त्रियों को गर्भ नहीं रहता।

5. कफजा– जो योनि अत्यन्त चिकनी हो, जिसमें खुजली चलती हो और जो भीतर से शीतल रहती हो वह ‘कफजा’ योनि है।

त्रिदोषज योनि रोग – 1. षंडी, 2. अण्डिनी, 3. महती, 4. सूचीवक्त्रा और 5. त्रिदोषजा- ये पांचों योनि-रोग तीनों दोषों के कारण होते हैं।

1.षण्डी – जिस स्त्री को मासिक धर्म न होता हो, जिसके स्तन छोटे हों और मैथुन करने से योनि लिंग को खरदरी मालूम होती हो, उसकी योनि ‘षण्डी’ होती है।

2. अण्डिनी– थोड़ी उम्र वाली स्त्री अगर बलवान पुरुष से मैथुन कराती है, तो उसकी योनि अण्डे के समान बाहर लटक आती है। उस योनि को ‘अंडिनी’ कहते हैं। इस रोग वाली का रोग समाप्त नहीं होता और इसको गर्भ भी नहीं रहता।

3. महती– जिस स्त्री की योनि बहुत फैली हुई होती है, उसे ‘महती’ योनि कहते हैं।

4. सूचीवक्त्रा– जिस स्त्री की योनि का छेद बहुत छोटा होता है, वह मैथुन नहीं करा सकती, केवल पेशाब कर सकती है। उसकी योनि को ‘सूचीवक्त्रा’ कहते हैं।

5. त्रिदोषजा– जब दिन में बहुत सोने, बहुत ही क्रोध और अत्यन्त परिश्रम करने, दिन-रात मैथुन कराने, योनि के छिल जाने अथवा नाखून या दांतों के लग जाने से योनि के भीतर घाव हो जाते हैं, तब वातादि दोष कुपित होकर, पीप और खून को इकट्ठा करके, योनि में बड़हल के फल- जैसी गांठ पैदा कर देते हैं, उसे ही ‘योनिकन्द – रोग’ कहते हैं।

आयुर्वेद चिकित्सा निदान के अनुसार  20 तरह की योनि और रोग उपचार…

1. यदि योनि में से राध निकलती हो, तो नीम के पत्ते जैसे शोधन पदार्थों को सेंधानमक के साथ पीस कर गोलियां बना लेनी चाहिए। इन गोलियों को रोज योनि में रखने से राध या  रिसाव निकलना बन्द हो जाता है।

2. यदि योनि में बदबू आती हो अथवा वह लिबलिबी हो, तो बच, अडूसा, कड़वे परवल, फूल प्रियंगू और नीम-इनके चूर्ण को योनि में रखें। साथ ही अमलताश आदि के काढ़े से योनि को पहले धोंये फिर चूर्ण रखें।

3. कर्णिका नामक कफजन्य योनि-रोग हो – गर्भाशय के ऊपर मांस-सा बढ़ा हो, तो नीम आदि शोधन पदार्थों की बत्ती बना कर योनि में रखवाना चाहिए।

4. गिलोय, हरड़, आमला और जमालगोटा- इनका काढ़ा बनाकर, उस काढ़े की धारों से योनि धोने से योनि की खुजली नष्ट हो जाती है।

5. कत्था, हरड़, जायफल, नीम के पत्ते और सुपारी – इनको महीन पीस कर छान लें। फिर इस चूर्ण को मूंग के यूष में मिला कर सुखा लें। इस चूर्ण के योनि में डालने से योनि सिकुड़ जाती है और जल का स्राव या पानी – सा आना बन्द हो जाता है।

6. सफेद जीरा, काला जीरा, पीपर, कलौंजी, सुगन्धित बच, अडूसा, सेंधा नमक, जवाखार और अजवायन- इनको पीस-छान कर चूर्ण बना लें। फिर इसे जरा सेक कर, इसमें चीनी  मिला कर लड्डू -बना लें। इन लड्डुओं को अपनी जठराग्नि के बलानुसार नित्य खाने से योनि के सारे रोग नष्ट हो जाते हैं।

7. वातला योनि में अथवा उस योनि में, जो कड़ी स्तब्ध और थोड़े स्पर्श वाली हो उसके पदें बिठा कर – तिली के तेल का फाहा रखनालाभप्रद होता है।

8. यदि योनि प्रस्रंसिनी हो, लिंग की रगड़ से बाहर निकल आई हो, तो उस पर घी मल कर दूध का बफारा दें और उसे हाथ से भीतर बिठा दें।

फिर नीचे लिखे वेशवार से उसका मुँह बन्द करके पट्टी बांध दें।

बेशवार चूर्ण...सोंठ, कालीमिर्च, पीपर,

धनिया, जीरा, अनार और पीपरामूल-इन

सातों के पिसे-छने चूर्ण को ‘बेशवार’ कहते हैं।

9. यदि योनि में दाह या जलन होती हो, तो नित्य आमलों के रस में चीनी मिला कर पीनी चाहिए; अथवा कमलिनी की जड़, चावलों के पानी में पीस कर पीनी चाहिए।

10. कड़वे नीम की निबौलियों को, नीम के रस में पीस कर, योनि में रखने या लेप करने से योनि-शूल मिट जाता है।

11. अरण्डी के बीज, नीम के रस में पीस कर गोलियां बना लें इन गोलियों को योनि में रखने या पानी में पीस कर इनका लेप करने से योनि-शूल मिट जाता है।

12. आमलों की गुठली, बायबिडंग, हल्दी, रसौत और कायफल- इनको बराबर-बराबर लेकर और पीस-कूट कर छान लें। फिर इस चूर्ण को ‘शहद’ में मिला – मिला कर रोज योनि में भरें। इस नुस्खे से ‘योनिकन्द’ रोग निश्चय ही नष्ट हो जाता है। किन्तु इसे भरने से पहले हरड़, बहेड़े और आमले के काढ़े में शहद मिला कर, उससे योनि को सींचना या धोना

उचित है; अर्थात् इस काढ़े से योनि को धो कर, पीछे ऊपर का चूर्ण शहद में मिला कर योनि में भरना चाहिए। काढ़ा नित्य ताजा बनाना चाहिए ।

13. करेले की जड़ को पीस कर योनि में उसका लेप करने से, भीतर की घुसी हुई योनिबाहर निकल आती है।

14. योनि में चूहे की चरबी का लेप करने से बाहर निकली हुई योनि भीतर घुस जाती है।

15. पीपर, कालीमिर्च, उड़द, शतावर, कूट और सेंधा नमक-इन सबको महीन पीस-कूट कर छान लें। फिर इस छने चूर्ण को सिल पर रख और पानी के साथ पीस कर, अंगूठे समान  बत्तियाँ बना बना कर छाया में सुखा लें।

इन बत्तियों के नित्य योनि में रखने से कफ-सम्बन्धी योनि-रोग- अत्यानन्दा; कर्णिका चरणा और अतिचरणा एवं कफजा योनि-रोग निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं और योनि बिल्कुल शुद्ध हो जाती है।

16. तगर, कूट, सेंधा नमक भटकटैया का फल और देवदारु – इनका तेल पका कर, उसी तेल में रूई का फाहा भिगो कर योनि में लगातार कुछ दिन रखने से वातज योनि-रोग– उदावृता, बन्ध्या, विप्लुता, परिप्लुता और वातला योनि- रोग अवश्य आराम हो जाते हैं।

17. कलौंजी की जड़ के लेप से, भीतर घुसी हुई योनि बाहर आती है और चूहे के मांस-रस की मालिश से बाहर आई हुई योनि भीतर चली जाती है।

18. पंचपल्लव, मुलहठी और मालती के फूलों को घी में डाल कर, घी को धूप में पका लें। इस घी को योनि पर लगाने से योनि की दुर्गन्ध नष्ट हो जाती है।

19. योनि को चुपड़ कर, उसमें बालछड़ का कल्क जरा गरम करके रखने से, वात की योनि – पीड़ा शान्त हो जाती है।

20. पित्त से पीड़ित हुई योनि वाली स्त्री को पंचवल्कल का कल्क योनि में रखना चाहिए ।

21. चूही के मांस को तेल में डाल कर, धूप में पकायें। फिर इसकी योनि में मालिश करें और चूही के मांस में सेंधा नमक मिला कर योनि को इसका बफारा दें। इन उपायों से योनि का मस्सा नष्ट हो जाता है। 22. शालई, मदनमंजरी, जामुन और धव-इनकी छाल और पंचवल्कल की छाल – इन सबका काढ़ा करके तेल पकायें। फिर उसमें रूई का फाहा तर करके योनि में रखें। इससे विप्लुता योनि-रोग नष्ट जाता है।

23. त्रिफले के काढ़े में ‘शहद’ डाल कर योनि सेचन करने या तरड़ा देने से योनिकन्द रोग आराम हो जाता है।

24. गेरू, अंजन, बायबिडंग, कायफल, आम की सबका चूर्ण करके और ‘शहद’ में मिला कर योनि में रखने से योनिकन्द रोग नष्ट हो जाता है।

25. देवदारु और सारिवा को ‘घी’ में मिला कर लेप करने से शिथिल योनि भी कड़ी हो जाती है।

26. कूट, धाय के फूल, बड़ी हरड़, फूली फिटकरी, माजूफल, हाऊबेर, लोध और अनार की छाल – इनको पीस कर और शराब में मिला कर लेप करने से योनि सख्त हो जाती है।

27. कड़वी तोरई के स्वरस में ‘दही का पानी’ मिला कर पीने से योनि-कन्द रोग नष्ट हो जाता है।

28. आग पर गरम की हुई लोहे की शलाका से योनिकन्द को दागने से, बहुत विकारों से हुआ योनिकन्द भी नष्ट हो जाता है।

29. अडूसा, असगन्ध और रास्ना- इनसे सिद्ध किया हुआ दूध पीने से योनि-शूल नष्ट हो जाता है। साथ ही दन्ती, गिलोय और त्रिफले के काढ़े का तरड़ा भी योनि में देना चाहिए ।

30. ढाक, धाय के फूल, जामुन, लजालू, कोचरस और राल इनका चूर्ण बदबू, पिच्छिलता और योनिकन्द आदि में लाभदायक होता है।

31. सिरस के बीज, इलायची, समन्दर – झाग, जायफल, बायबिडंग और नागकेसर- इनको पानी में पीस कर बत्ती बना लें। इस बत्ती को योनि में रखने से समस्त योनि-रोग नष्ट हो जाते हैं।

32. बड़ी सौंफ का अर्क योनि-शूल, मन्दाग्नि और कृमिरोग को नाश करता है।

33. आक की जड़ ला कर स्त्री अपने पेशाब में पीस ले। फिर शाफा करके दो घण्टे बाद मैथुन करे। ऐसा करने पर योनि सख्त हो जाती है। )

34. सूखे केंचुए भग में मलने से बड़ा आनन्द आता है।

35. बबूल की छाल, झड़बेरी की छाल, मौलसरी की छाल, कचनार की छाल और अनार की छाल – इन सबको बराबर-बराबर लेकर कुचल लें और एक हाँड़ी में अन्दाज का पानी भर कर जोश दें। औटाते समय उस हाँड़ी में एक सफेद कपड़ा भी डाल दें। जब कपड़े पर रंग चढ़ जाये, तो उसे निकाल लें। इस काढ़े से योनि को खूब धोएं। इसके बाद, इसी काढ़े में रंगे हुए कपड़े को भग में रख लें। इस तरह करने से योनि सिकुड़ जाती है।

36. ढाक की कोपलें या कलियां ला कर छाया में सुखा लें। सूखने पर पीस – छान लें और बराबर की, पिसी हुई मिश्री मिला कर रख दें। इसमें से एक मात्रा चूर्ण रोज सात दिन तक खायें। सात दिन बाद योनि तंग हो जाती है। अगर कुछ कसर हो, तो और भी कई दिन तक दवा का सेवन करें।

मात्रा-सवा दो माशे से नौ माशे तक।

अनुपान – शीतल जल।

37. सूखी बीर बहूटी घी में पीस कर भग में मलने से, भग तंग हो जाती है। –

38. बकायन की छाल ला कर सुखा लें। फिर पीस-छान कर रख लें। इसमें से कुछ चूर्ण, रोज भग में रखने से भग तंग हो जाती है । ख़ट्टे पालक के बीज कूट-छान कर भग में रखने से भी योनि सिकुड़ जाती है।

39. इमली के बीजों की गिरी कूट-छान कर रख लें। सबेरे-शाम इस में मलने से भग तंग हो जाती है।

40. समन्दर-झाग और हरड़ के बीजों की गिरी बराबर-बराबर लेकर पीस लें। इस चूर्ण को भग में रखने से भग तंग हो जाती है।

41. जामुन की जड़ की छाल, लोध और धाय के फूल-इन सबको पीस कर, ‘शहद’ में मिलाकर योनि में लेप करने से योनि सिकुड़ जाती है।

42. अकेली अमलताश की छाल से योनि को धोयें। इस उपाय से योनि साफ होकर सिकुड़ जाती है।

संस्कृत हिन्दी शब्दकोश के अनुसार योनि 

के नाम और अर्थ क्या?…जाने

योनि: (पुं०, स्त्री०) [यु+नि ] 1. गर्भाशय,

बच्चेदानी, भग, भोषड़ा, छेद, महासागर,

चूत, स्त्रियों की जननेन्द्रिय

2. जन्मस्थान, मूलस्थान,

जीव जगत उद्गम स्थल,

मूल, जननात्मक कारण,

निर्झर, फौवारा –

सा योनिः सर्ववैराणां सा हि लोकस्य निर्ऋतिः – (उत्तर० 5/30),

उत्पन्न या उदित के अर्थ में प्रयोग।

 प्रायः समास के अन्त में – भग० 5/22,

3. खान

4. आवास, स्थान, भाजन या पात्र, –

आसन, आधार

5. घर, माँद

6. कुल, गोत्र, वंश, जन्म,

अस्तित्व का रूप- जैसा कि

 ‘मनुष्ययोनि, क्षि, पश° आदि

7. जल सम० – गुणः (पुं०) जन्मस्थान

या गर्भाशय का गुण, ज (वि०)

गर्भाशय से जन्म लेने वाला,

जरायुज, – देवता (स्त्री पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, –

भ्रंशः (पुं०) बच्चेदानी का अपने स्थान से हट जाना,

रञ्जनम् (नपुं० ) रजःस्राव, लिंगम् (नपुं)

भगांकुर, चिकु, – संकरः (पुं०)

अवैध अन्तर्जातीय विवाहों से उत्पत्र

वर्ण संकर जाति।

आयुर्वेद के प्राचीन पांडुलिपियों में 10 गुप्त

स्त्री रोगों का वर्णन है। यथा..

प्रदर रोग

सोमरोग

योनि रोग

नष्टार्त्तव

गर्भवती स्त्री के रोग

प्रसूता के रोग

स्तन रोग

बंध्यत्व रोग या बांझपान

गर्भस्त्राव एवम गर्भपात

अवरुद्ध प्रसव

मृत गर्भ

दूध के दोष।

इन रोगों के अंतर्गत 66 स्त्रीरोग समाहित हैं। इसकी जानकारी पिछले लेखों में दी जा चुकी है।

वर्तमान प्रदूषण युग में ऐसी

कोई लडकी या महिला नहीं है, जो किसी न

किसी नारी व्याधि से पीड़ित न हो।

आजकल नई उम्र की लड़कियों, नवयुवतियों, अधेड़ स्त्रियों और उम्रदराज हो चली महिलाओं को एक खतरनाक स्त्री रोगों ने अपने आगोश में ले लिया है।

पीसीओडी से होने वाली बीमारियों के सिम्टम्स…..

चेहरे पर बालों का उगना, कील-मुहांसे, झुर्रियां, शिकन, आकर्षण न होना, अनियमित पीरियड या 16 वर्ष की आयु तक माहवारी न होना और भविष्य में माँ के सुख से वंचित होना आदि समस्याएं हो सकती हैं।

पीसीओडी या सोमरोग के कारण वजन तेजी से घटने या बढ़ने लगता है। खूबसूरती खत्म होने लगती है। आत्मविश्वास डवांडोल हो जाता है।

हमारी सलाह है कि पीसीओडी से पीड़ित लड़कियां अमृतम द्वारा निर्मित नारीसौन्दर्य माल्ट एवं कैप्सूल इन दोनों आयुर्वेदिक दवाओं का नियमित 3 माह तक सेवन करें तथा नारी सौन्दर्य तेल सेसु बह की धूप में  मालिश करें।

Quantity: 50 Capsules, 🌙 Helpful in managing PCOS, 🌙 Regulates delayed, irregular periods, 🌙 Improves fertility, 🌙 Helps provide relief from

छोटी उम्र की युवा लड़कियों में पीसीओडी या

सोमरोग होने से युवतियों के शरीर में पुरुष

रक्तजनित स्त्राव अर्थात मेल हार्मोन्स एंड्रोजन

ज्यादा बनने की वजह से लड़कियों या नारियों

को अनेक अंदरूनी परेशानी पैदा होने लगती हैं।

सोमरोग या पीसीओएस या पीसीओडी क्या है?…. (What is PCOS or PCOD)

वर्तमान समय में नवयुवतियों और महिलाओं के बीच सोमरोग पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम या पीसीओएस (PCOS) एक मेटाबोलिक, हार्मोनल और साइकोसोशल बीमारी है।

सोमरोग का समय पर उपचार न होने से उच्च या निम्न रक्तचाप यानि बीपी की समस्या उच्च कोलेस्ट्रॉल, चिंता और अवसाद, स्लीप एपनिया (सोते समय शरीर को पूरी ऑक्सिजन न मिलना), दिल का दौरा, मधुमेह और एंडोमेट्रियल, डिम्बग्रंथि व स्तन कैंसर के लिए कमजोर बना सकता है।

एक शोध के अनुसार पांच में से एक वयस्क महिला और पांच में से दो किशोरी पीसीओएस से पीड़ित है। मुंहासे और हिरसुटिज्म (PCOD Symptoms) के सबसे बुरे लक्षण हैं।

सोमरोग की वजह से अनेक लड़कियों को पीरियड के समय काफी दर्द होता है। वे पढ़ाई भी नहीं कर पाती।

चेहरे पर मुंहासे, दाग धब्बे, कम उम्र में झुर्रियां आना और बालों का झड़ना-टूटना, रूखापन वर्तमान में एक आम समस्या बन गए हैं। इस कारण लड़कियों को कई बार शर्मिंदा होना पड़ता है।

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) वाली महिलाओं में मनोवैज्ञानिक तनाव बना रहता है और इससे पैदा होने वाले बच्चों में ऑटिज्म होने की अधिक संभावना हो सकती है।

पीसीओडी या सोमरोग के २२ लक्षण और दुष्प्रभाव….

【1】तेजी से बाल झड़ने-टूटने लगते हैं।

【2】माथा शिथिल हो जाता है।

【3】मुख और तालु सूखने लगते हैं।

【4】सोमरोग/पीसीओडी के कारण स्त्री योनि

से तरल पदार्थ या पानी रिसता रहता है। योनि में

खुजली होती है। इम्यूनिटी कमजोर हो जाने से

बेचेनी बनी रहती है।

【5】दिनभर आलस्य, और शरीर थका सा

रहता है, जंभाई आती है।

【6】त्वचा या चमड़ी में रुखापन आकर

त्वचारोग खुजली आदि होने लगती है।

【7】मन बैचेन, अशांत, तनाव तथा प्रलाप,

रोते रहने की इच्छा रहती है।

【8】जीवन पहाड़ सा लगता है। जीने का रुझान,

लगाव मिट जाता है।

【9】अवसाद (डिप्रेशन), डर, भय, भ्रम, चिंता

बनी रहने से गहरी नींद नहीं आती।बना रहता है।

【10】आत्मविश्वास टूट जाता है।

【11】खाने-पीने, सोने का मन नहीं करता और

कुछ भी अच्छा नहीं लगता, खाया-पिया भी नहीं पचता।

【12】पाचनतंत्र बिगड़ जाता है।

भूख काम लगती है। जीभ स्वाद रहित हो जाती है।

【13】हमेशा कुछ न कुछ अतृप्ति,

अपूर्णता महसूस होती है।

【14】स्वभाव क्रोधी एवं चिड़चिड़ा हो जाता है।

【15】कहीं आने-जाने, मिलने-मिलाने और

बात करने की इच्छा नहीं होती।

【16】 गर्भ नहीं ठहर पाता। वह माँ नहीं बन पाती।

【17】सेक्स के प्रति अरुचि होने लगती है।

【18】सुंदरता, खूबसूरती नष्ट होने लग जाती है।

सोमरोग में उपरोक्त लक्षण प्रगट होते है।

अमृतम आयुर्वेद में कई तरह के स्त्रीरोगों के बारे

में बताया है। “सोमरोग” (PCOD) को असाध्य

स्त्री रोगों में गिना जाता है।

सोमरोग की उत्पत्ति- जिन कारणों से

“प्रदररोग” (लगातार सफेद पानी आना)

 होता है ।

 इसे leucorrhea, (लिकोरिया)

 white discharge (व्हाइट डिस्चार्ज)

 भी कहते हैं ।इसका सम्पूर्ण इलाज आयुर्वेद

 के ग्रन्थों में उपलब्ध है।

पीसीओडी की समय पर करें उपचार...

जब किसी स्त्री का सोमरोग पुराना हो जाता है,

तब “मूत्रातिसार” अर्थात बार पेशाब आना,

प्रमेह, मधुमेह आदि परेशानी पैदा होने लगती है।

नारी जरा सी देर भी पेशाब रोक नहीं पाती।

दुष्परिणाम यह होता है कि तन-मन का सारा

बल, ऊर्जा, शक्ति नष्ट होकर मरनासन्न स्थिति

में पहुंच जाती है।

पीसीओडी या सोमरोग का स्थाई इलाज

आयुर्वेद अथवा देशी घरेलू चिकित्सा के

अलावा अन्य पध्दति या पेथी में स्थाई

कोई इलाज नहीं है।

एलोपैथी रसायनिक दवाओं से शरीर

जीर्ण-शीर्ण हो सकता है।

कम खाओ गम खाओ वाली विचारधारा

विविध विकारों का विनाश करने में सहायक है।

मन में अमन और जीवन में चमन चाहिए,

तो परमात्मा प्रदत प्राकृतिक पदार्थों का प्रयोग

करें एवं असरकारक अमृतम आयुर्वेदिक औषधि

नारी सौंदर्य माल्ट का नियमित सेवन करें।

तन को पतन से बचाने हेतु उपयोगी है —

नारी सौंदर्य माल्ट…

 पूर्ण प्राकृतिक 20 से अधिक गुणकारी वनस्पति

जड़ी बूटी रस औषधियों के मिश्रण से तैयार ये

अवलेह अनेक आधि – व्याधियों का नाशक है।

नारी सौंदर्य माल्ट हर महीने मासिक धर्म

समय पर लाकर तन के रोगों का पतन कर

मानसिक शांति देता है

भावनात्मक संतुलन रक्त की शुद्धि त्वचा की

कांति शारीरिक एवं मानसिक ऊर्जा के स्तर को बढ़ाकर नई नारियों में नकारात्मक नखरे का नाश कर… तन मन में नजाकत नवीनता नाजुकता मैं वृद्धि करके नारी को बुरी नजर से बचाता है।

अविवाहित अथवा गर्भावस्था से लेकर प्रसव

के बाद भी ताउम्र लेते रहने से लंबे समय तक

यौवनता प्रदान करता है

विशेष — धर्म सत्कर्म पूजा प्रार्थना प्राणायाम

एवं योग ध्यान का अभ्यास औषधि के असर

को और अधिक असरकारक बना देता है।

नारी सौंदर्य माल्ट में मिश्रित घटक-द्रव्य…

स्त्री रोगों में उपयोगी दशमूल, धात्री लोह,

त्रिवंग भस्म, सिता और कुक्कवाण्डत्व भस्म,

हरड़ मुरब्बा आंवला मुरब्बा, किशमिश आदि के मिश्रण मैं इसे और भी असरकारक बना दिया है, ताकि नारी सौंदर्य माल्ट

सभी उम्र की महिलाओं को कारगर सिद्ध हो।

ऑनलाइन उपलब्ध है

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यूट्यूब पर नारी सौंदर्य के बहुत से वीडियो

भी देख सकते हैं।

यह लेख ज्ञानवर्धक लगे, तो लाइक, कॉमेंट,

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