धर्म और आहार

स्वस्थ्य,निरोगी,आरोग्यता दायक सूत्र-
हम कैसे स्वस्थ्य रहें

अमृतम आयुर्वेद के लगभग 100 से अधिक ग्रंथों में तंदरुस्त,स्वस्थ्य-सुखी, प्रसन्नता पूर्वक जीने के अनेकों रहस्य बताये गये हैं।

धर्म और आहार-
मन में जैसे विचार आते हैं,वैसा ही वाणी से बोला जाता है और वैसा काम भी होता है। हमारे मन पर ही सब कुछ निर्भर है और हमारा यह मन आहार-शुद्धि पर टिका हुआ है  —-

आहारशुद्ध्यो सत्वशुद्धि: सत्वशुद्धो
ध्रुवा स्मृति:
स्मृतिलम्भे सर्वग्रंथीनां विप्रमोक्ष:!”

(छान्दोग्य.ग्रन्थ ७/२६/२)
अर्थात- “आहार शुद्धि से सत्व की शुद्धि होती है, सत्व की शुद्धि से निश्छल स्मृति, प्रखर बुद्धि
(सुपर मेमोरी) की प्राप्ति होती है। मन की निश्छलता से व्यक्ति रोगों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
हमें बीमारियों के भार से बचने के लिए हमेशा आहार यानि खान-पान पर ध्यान देना चाहिए।
शुद्ध आहार स्वस्थ्य रखने का सबसे बड़ा हथियार है।
■ हमारा भोजन,खान-पान ऐसा हो जिससे हमारी बुद्धि,अवस्था और बल में निरन्तर वृद्धि होती रहे।
■■ फल,मेवे,कंदमूल (गाजर-मूली), साग,भाजी, गेंहू, चावल, जौ, ज्वार, मूंग की दाल,मकई, नारियल,बादाम, किसमिस, अखरोट, नाशपाती, केला, नारंगी, अंगूर, दही, आदि को आयुर्वेद में शुद्ध आहार बताया है। यह शरीर के लिए पोषक हैं।
■■■ हमारे द्वरा ग्रहण किया गया आहार का केवल चौथा अंश ही हमारा पोषण करता है।

धर्म और उपवास-व्रत-

आयुर्वेद,”व्रतराज” आदि
धर्मग्रंथों  में उपवास,व्रत एवं रोजा रखने का विशेष महत्व बताया है। उपवास आदि से शरीर तथा मनोवृत्तियों में निर्मलता आती है। अवसाद मुक्ती के लिए व्रत,रोज बहुत ही लाभकारी हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से ज्वर,जुकाम,नजला,श्वांस,
सर्दी,खाँसी,दमा,सूजन,अपच,कब्ज, वातरोग,
त्वचारोग, वायुविकार,मधुमेह,गुर्दा (किडनी)
के रोग, आदि मनोविकृतियाँ दूर हो जाती हैं।

कार्तिक-महात्म्य” नामक ग्रन्थ में लिखा है कि स्वस्थ्य रहने के लिए उपवास से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है।
सूर्योपासना और स्वास्थ्य-

सूर्य प्रणाम,सूर्योपासना हरेक मनुष्य के स्वास्थ्य व आत्मबल हेतु एक अत्यंत लाभदायक कृत्य है। सूर्य से हमारी आत्मा को बल मिलता है।
सूर्य हमारे मनोबल को बढ़ाते हैं। सूर्य से ही हमें
प्रसन्नता,स्वास्थ्य, सौन्दर्य और यौवन आदि की प्राप्ति होती है।
यजुर्वेद ७/४२ की प्रसिद्ध ऋचा है-
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषशच
अर्थात- सूर्य ही स्थावर-जङ्गम पदार्थो की आत्मा है।
अतः सूर्य से हम प्रार्थना करते हैं —
जीवेमशरद:शतम” (यजुर्वेद३६/२४)
हम सौ वर्षों तक निरोगता पूर्वक जीवित रहें।

सूर्य-स्नान करने से अनेक रोगों – टायफाइड,
यक्ष्मा,संक्रमण,वायरस आदि के कीटाणु नष्ट
हो जाते हैं।
सूर्य के विषय में कुछ दुर्लभ जानकारियां-

सूर्य स्नान की प्राचीन परम्पराओं में एक माह का कार्तिक स्नान आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता है।
मैंगलौर (कर्नाटक) से करीब 80 किमी दूर
धर्मस्थला” नामक तीर्थ में सूर्य स्नान करने से
केन्सर जैसे असाध्य रोग खत्म हो जाते हैं।

दक्षिण भारत के कुम्भकोणम से 10 किमी दूर
सूर्यनारकोइल” नामक तीर्थ के दर्शन से अनेक बीमारियों से मुक्ती मिल जाती है।

भिंड जिले में मिहोना के पास “बालाजी तीर्थ” बहुुुत प्राचीन सूर्य तीर्थ है।

कालपी (पुराना वैदिक नाम कालप्रिय) भगवान शिव की तपस्या स्थली,यहीं पर

सृष्टि में सर्वप्रथम काल की सूक्ष्म गणना की गई थी तथा ऋषि वेदव्यास की जन्मस्थली,जमुना नदी का किनारा एवं

◆ दतिया जिले में स्थित “उन्नाव बालाजी तीर्थ” त्वचारोग की शान्ति,मुक्ती हेतु एक प्राचीन सूर्य मंदिर है।

आरोग्य – चिन्तन – प्रेरक – निर्देश

के लेखक श्रीराधाकृष्ण सहारिया ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि-स्वास्थ्य एवं आहार के नियम न जानने से व्यक्ति बार-बार रोगों का शिकार होता रहता है।
कुदरत के नियमों की अवहेलना करना बहुत बड़ा अपराध माना है। इसीलिए रोगियों को बीमारी रूपी सजा भोगनी पड़ती है।

उन्होंने अपने अनुभव शेयर करते हुए लिखा कि-

1- केवल दवाओं से रोगों का समूल नाश नहीं होता। दवा का अर्थ ही किसी रोग को दबाना,ठीक करना नहीं। कोई भी रोग दवा के प्रभाव से आज दब जाएगा,निश्चित ही कल पुनः पनप जाएगा। इसलिए रोगों को सदा प्राकृतिक उपायों द्वारा ही ठीक करने
का प्रयास करना चाहिए।
2- प्राचीन काल से ही “अमृतम आयुर्वेद चिकित्सा” को निरापद अर्थात पूरी तरह हानि रहित तथा रोगों को जड़-मूल से ठीक करने वाला बताया गया है। यह तन-मन से विष को निष्क्रिय कर देती हैं।
3- रोगों का समूल नाश इन्द्रिय-संयम और
मन की शुद्धि होने पर ही हो सकता है।
4- भोजन की ज्यादा ललक, स्वादिष्टता का
प्रलोभन इतना अहितकर है कि हमारा शरीर अनेक विकार व विकृतियों से घिर जाता है उसका दुष्परिणाम स्वास्थ्य-नाश की भारी क़ीमत चुकाने के रूप में भुगतना पड़ता है।
5- अमृतम आयुर्वेद के अनुसार महत्व भोजन का नहीं,पाचनशक्ति का है।
6- अरहर की पीली दाल
बहुत गर्म और गरिष्ठ होती है,इसे पचाने के लिए
10 से 15 गुना पानी अधिक पीना जरूरी है।
7- रात्रि में दही खाने से पाचन तंत्र (मेटाबॉलिज्म) दूषित हो जाता है। वायु-विकार एवं त्वचारोग उत्पन्न हो जाते है। सिर में तनाव व भारीपन रहता है। अतः रात में दही भोज्य तत्काल त्यागने का निर्देश है।
8- सुबह उठते ही खाली पेट 3 से 4 गिलास पानी पीना उदर,रक्तचाप,हृदयरोग,मधुमेह के लिए बहुत ही हितकारी है।
9- बीमारियों का सम्बन्ध केवल शरीर से न होकर, कभी-कभी मन की तरंगों से भी होता है। आयुर्वेदाचार्यों का मानना है कि रोग पहले मन में उत्पन्न होते हैं। मन के अच्छे होने से तन रोगरहित रहता है।
10- तन को स्वस्थ्य रखने हेतु अङ्ग-प्रत्यंगों को
मजबूत बनाना आवश्यक है। मन से कमजोर आदमी कितना ही जोर लगा ले,उसका स्वस्थ्य रह पाना असम्भव होता है।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्य:”
(मुण्डकोउपनिषद ३/२/४)
अर्थात- जो मनुष्य बलहीन या उत्साहहीन
होता है। वह हमेशा शारीरिक और मानसिक
रोगों से परेशान रहता है। इस कारण वह प्रायः
सुख-साधन,सफलता के मार्ग पर भलीभांति
अग्रसर नहीं हो पाता। स्वयं को,अपनी आत्मा को समझ पाने में निराश रहता है। ऐसे लोगों की आस्था कभी स्थिर नहीं हो पाती। इस कारण वे सदैव रोगों से दुःखी रहते हैं।
11- परमात्मा स्वरूप “श्रीगुरुनानक देव” ने गुरुग्रन्थ साहिब में कहा है कि- संसार में बहुत दवाएँ हैं, किन्तु प्रार्थनारूपी महौषधि से त्रिताप,त्रिदोष एवं त्रिशूल का सहज ही निवारण होता आया है।
12- वैद्य श्री कृष्णगोपाल कालेड़ा के अनुसार एक साधारण रोगी की अपेक्षा भयग्रस्त रोगी असाध्य होता है।  भय एवं चिन्ता करने से रक्त का शुद्ध रहना असम्भव हो जाता है। त्वचारोग और वातविकार तन में हाहाकार,उत्पात मचा देते हैं।
13- शरीर विज्ञान नामक किताब के हिसाब से मस्तिष्क को शुद्धरक्त अवश्य प्राप्त होना चाहिए। सुचारू रक्तसंचरण से ही मन मलङ्ग रहता है। रक्त  संचार के बाधित होने से खून की नाड़ियाँ कमजोर होकर अनेक रोग पैदा करती हैं।
रक्त अवरोध के कारण ही थाईराडिज़्म,

थाइराइड, ग्रंथिशोथ,मानसिक विकार

तन और मब मस्तिष्क होते रहते हैं।

14- अपने विचारों को विकसित करें। सोच का प्रभाव केवल मस्तिष्क पर ही नहीं होता,बल्कि
शरीर के प्रत्येक अङ्ग पर होता है।
15- व्यक्ति सदैव अपनी इच्छा-शक्ति के बल पर अपने-आप को निर्देश देता रहे कि उसे कोई रोग नहीं है,वह पूरी तरह ठीक है,स्वस्थ्य है। यह सोच-विचार,आत्मविश्वास से हृदय में प्रवाहित
होने वाली अपनी आस्था एवं विश्वास रूपी लहरों से निरोग रहने का बल व शक्ति प्राप्त होती रहेगी और धीरे-धीरे स्वास्थ्य में चमत्कारी रूप से सुधार शुरू हो जाएगा।
16- दक्षिण भारत के पुराने “ज्योत्स्निका” नामक आदि आयुर्वेद ग्रंथों में दीपज्योति,ज्योतिर्गमय, ज्योतिर्लिंग दीप पूजा अर्थात विशेष समय,महूर्त में दीपक जलाकर 

स्वस्थ्य होने की प्रार्थना, कामना करना आदि की वैदिक नियम है।
17- तिरुअन्नामलय, अग्नितत्व शिंवलिंग एवं “तिरुपति बालाजी“, तथा “श्रीकालहस्ती वायुतत्व” स्वयंभू शिवालयों में असाध्य रोगों की मुक्ती के लिए दीपांकर,दीपअलङ्कार चिकित्सा का विधान भी
बहुत ही स्वास्थ्यवर्द्धक उपाय है। इस प्रक्रिया में असाध्य रोग से पीड़ित रोगी के नाम से हजारों दीपक जलाए जाते हैं। यह बहुत ही गोपनीय प्रयोग है।

निश्चित रोग नाशक उपाय-

एक बहुत ही प्राचीन ग्रन्थ”ज्योतिकल्पतरुग्रन्थ” में उल्लेख है कि 9 मंगलवार  राहुकाल में (दुपहर 3 बजे से 4.30 के बीच)
और 7 शुक्रवार राहुकाल में (सुबह 10.30 से 12 बजे के बीच) अमृतम फार्मा.द्वारा निर्मित
राहुकी तेल” के अपनी उम्र अनुसार किसी भी शिवमंदिर में  दीपक जलाने से जटिल से जटिल असाध्य रोग मिट जाते हैं।

भगवान महावीर की यह सूक्ति
“जिओ और जीने दो” हमें धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष
चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति कराकर स्वस्थ्य व शतायु बना सकता है। इसके लिए आहार का शुद्ध-पवित्र होना बहुत महत्वपूर्ण है।
जैन धर्म में आहार योग,मेल जरूरी है,इसके न मिलने पर जैन धर्माचार्य,साधुगण भोजन ग्रहण नहीं करते। यह बहुत ही जटिल प्रक्रिया है।
आहार जी” नामक एक जैन धर्म का यह तीर्थ टीकमगढ़ जिले में स्थित है,जहां अनेको सिद्ध जैन तपस्वियों की तपःस्थलीं है।

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